॥ जीवन-पथ ॥
मैं अनजाना पथिक भटकता ,
जीवन के दोराहे पर,
मानस के मैं द्वंद में उलझा ,
तर्कों के चौराहे पर ।
हूँ भ्रमित, है मन चकराया सा,
दृष्टि भी है धुंधलाई सी ,
निष्प्राण सा मैं बढ़ता जाता ,
मृत्यु से हुई सगाई सी ॥
मैं अनजाना पथिक भटकता ,
जीवन के दोराहे पर,
मानस के मैं द्वंद में उलझा ,
तर्कों के चौराहे पर ।
हूँ भ्रमित, है मन चकराया सा,
दृष्टि भी है धुंधलाई सी ,
निष्प्राण सा मैं बढ़ता जाता ,
मृत्यु से हुई सगाई सी ॥
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