ग़ज़ल : मेरा हाथ थाम लो तो सबको जवाब हो जाए।
ज़िंदगी की आखिरी करामात हो जाए ,
चलो आज मौत से मुलाकात हो जाए ।
इस उम्मीद में निकला हूँ, मिल जाए कोई इंसां ,
बरसों चुप रहा, अब किसी से बात हो जाए ।
बरसात आ गई है, कुछ बीज मैं भी बो दूँ ,
शायद हरी-भरी फिर ये क़ायनात हो जाए ।
अक्सर ही पूछता हूँ, मैं ये सवाल खुद से ,
क्या करूँ कुछ ऐसा , कि वो खुशमिज़ाज़ हो जाये।
उम्र से ही पहले दिखने लगा हूँ बूढ़ा ,
चलो सफ़ेद बालों में, अब ख़िज़ाब हो जाए ।
पीठ पीछे ताने सबने दिए हैं मुझको ,
मेरा हाथ थाम लो तो , सबको जवाब हो जाए ।
1 टिप्पणी:
Sandesh bhai, ye kavita padh ke aisa laga jaise tumne kayi ehsaso ko shabd diye hai. Jitni tarif ki jaye kam hai...
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