मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

ग़ज़ल : मेरा हाथ थाम लो तो सबको जवाब हो जाए।


ग़ज़ल : मेरा हाथ थाम लो तो सबको जवाब हो जाए। 



ज़िंदगी की आखिरी करामात हो जाए ,

चलो आज मौत से मुलाकात हो जाए ।


इस उम्मीद में निकला हूँ, मिल जाए कोई इंसां ,

बरसों चुप रहा, अब किसी से बात हो जाए ।


बरसात आ गई है, कुछ बीज मैं भी बो दूँ ,

शायद हरी-भरी फिर ये क़ायनात हो जाए ।


अक्सर ही पूछता हूँ, मैं ये सवाल खुद से ,

क्या करूँ कुछ ऐसा , कि वो खुशमिज़ाज़ हो जाये।


उम्र से ही पहले दिखने लगा हूँ बूढ़ा ,

चलो सफ़ेद बालों में, अब ख़िज़ाब हो जाए । 


पीठ पीछे ताने सबने दिए हैं मुझको ,

मेरा हाथ थाम लो तो , सबको जवाब हो जाए ।  

1 टिप्पणी:

Bhavatosh ने कहा…

Sandesh bhai, ye kavita padh ke aisa laga jaise tumne kayi ehsaso ko shabd diye hai. Jitni tarif ki jaye kam hai...